Saturday, July 28, 2012

बचपन के दिन..















वो बचपन के दिन भी क्या अजीब होते थे ,
कभी बेफिक्र से होकर हम गलियों में  दौड़ते थे,
तो कभी बापू के कन्धों पे सर रखके, चैन से सोते थे। 

कभी गाँव के बूढ़े लगड़े को चिढ़ाकर जोर से हँसते थे,
तो कभी एक मिठाई के लिए माँ से,कितना रोते थे। 
कैरियर की चिंता उन पेड़ों की डालियों में कहीं खोयी थी,
तब जेब में रक्खे पाँच पैसे भी,एक दौलत से होते थे। 

बारिश के पानी में बने उन छोटे से गड्ढों को,
तालाब  समझकर,मजे से तैरा करते थे !
हवा में हिलती परछाइयों  को भूत सोचकर,
भागते थे हम,और अँधेरे से कितना डरते थे। 

कभी भाई के डर से,अपने हिस्से की मिठाई ,
कोठरी में छिपाकर रख आते थे,
और कभी दीदी से रोनी सी सूरत बनाकर,
एक टॉफी के लिए दस पैसे मांगते थे। 

कैसे दादी के लिए दवाई लेने,दूसरे गाँव ,
हकीम चाचा के पास,मीलों नँगे पाँव दौड़ जाते थे,
रास्तों में पड़े पत्थरों को कभी ठोकर मारते,
तो कभी भूख लगने पर,दूसरों के पेड़ों से आम चुराते थे। 

अब सोचते हैं उन दिनों को,तो खुद पे हँसी आती है,
कैसे जंगली से हम,धूल-मिट्टी में खेला करते थे ,
अमीर गरीब का फर्क भी न समझते थे उन दिनों ,
और फटीचर लड़कों के साथ,गाँव का मेला देखते थे। 

अब कभी जब गाँव की गलियों में किसी बच्चे को,
बापू का हाथ थामे,बेफिक्र सा जाते देखता हूँ,
तो सोचता हूँ कि इन गलियों मे,आखिर मैं कहाँ रह गया,
खेलता रहता था अक्सर जो,माँ के आँचल तले ,
वो बचपन, वक़्त के दरिया में न जाने कहाँ बह गया !
 

Wednesday, July 18, 2012

लम्हों की बारिशें..



कोशिशें नाकाम होंगी ,छुपाने की ,
झूठी मुस्कुराहटों में  हमें ,
जब भी मिलोगे खुद से ,
हम याद तो बहुत आयेंगे !
देखोगे पलट के कभी,
तो हम लम्हों की बारिशों में ,
कहीं चुपचाप खोये से खड़े,
भीगते नज़र  आयेंगे !

Hope

Looking out of the window, as things pass by, Wishing we could survive this catastrophe. The one which looked impossible at first, But t...