भीड़ तो दिखती है यहाँ अब भी बहुत,
फिर भी कुछ सूना सा ये शहर लगता है !
रहेने दो हमें इन्ही अंधेरों के तले ,
अब खुले असमानों से बड़ा डर लगता है !
आसान नहीं है तोडना ये उलझनों की दीवारें ,
बाहर तूफानों से घिरा ये मंजर लगता है !
यादों की महेफिलों में गुजरता है वक़्त अक्सर ,
अब कुछ वीरानियो से सजा ये घर लगता है !
फिर भी कुछ सूना सा ये शहर लगता है !
रहेने दो हमें इन्ही अंधेरों के तले ,
अब खुले असमानों से बड़ा डर लगता है !
आसान नहीं है तोडना ये उलझनों की दीवारें ,
बाहर तूफानों से घिरा ये मंजर लगता है !
यादों की महेफिलों में गुजरता है वक़्त अक्सर ,
अब कुछ वीरानियो से सजा ये घर लगता है !
