Tuesday, December 25, 2012

क्षितिज़ के पार ..


















नदी की ओर,दूर क्षितिज़ के पार,
आज फिर उधर एक सूरज सा निकला।
धुंधलाया सा, अलसाया सा था,
निकला बादलों की आड़ से छिपता -छिपाता ।
कुछ पल को तो एकटक सा देखता रहा,
 फिर मिलने उसे,बेफिक्र हो ,मैं चल पड़ा ।
पंहुचा उधर तो वो न था,
बस बचा था कुछ रौशनी का कारवाँ ।
हँसा खुद की नादानियों पे मैं बहुत ,
फिर मुस्कुराकर खुद से कहा ।
सूरज है वो, रुकता नहीं ,
कुछ पल को था, फिर उड़ चला ।
दिन अब यूँ ही गुज़रता है अक्सर सोचने में ,
आएगा वो वक़्त मेरा भी कभी ,
रूबरू उससे जब मैं मिलूँगा ।
उम्मीद है उस दिन मेरे इंतज़ार मे ,
वो भी वही ठहेरा सा होगा ..
दूर क्षितिज़ के पार .....।

Thursday, October 18, 2012

Victim of Looks















Yesterday night,On the way back to home,
She was scared while walking alone.
She forced a smile but her eyes terrified,
She was hit from back,in pain she cried.
She was assaulted,she was raped,
Her eyes motionless,as time escaped.
Her face was scarred,and the limbs broken,
Her spirits died and her heart shaken.
The arms were twisted, and the jaws deflated,
Her throat was chocked,and the body mutilated.
Taking her last breaths,she silently repeated,
What wrongs did I do,what sins have I committed.
Left alone on the road and waiting to die,
God..! Is this what for I was created ?
Finally,the breeze smoothed and the blood dried,
all over the pages of her scattered books.
The incident was nothing unusual,
She was just another victim of her looks.

Sunday, October 7, 2012

Moments..
















Where is the life I seek,
And the time which has gone.
Far lie those fragments,
And I am lost in my own.
In the jumbles of time,
I see my traces fade,
Shrouded by the wonders,
Of this scrambles of fate.
But I keep on walking,
through the mist I wade,
In the search of moments,
towards the life who aggregate.

Sunday, September 9, 2012

When..













 When everything seems to go wrong,
And the dark starts soaring high,
When no more I can breath,
When even the skies want to cry.
when I stumble upon every stone,
And my faith slowly starts to die.
Then..I just want to hold you tight,
until this night passes by...

Saturday, July 28, 2012

बचपन के दिन..















वो बचपन के दिन भी क्या अजीब होते थे ,
कभी बेफिक्र से होकर हम गलियों में  दौड़ते थे,
तो कभी बापू के कन्धों पे सर रखके, चैन से सोते थे। 

कभी गाँव के बूढ़े लगड़े को चिढ़ाकर जोर से हँसते थे,
तो कभी एक मिठाई के लिए माँ से,कितना रोते थे। 
कैरियर की चिंता उन पेड़ों की डालियों में कहीं खोयी थी,
तब जेब में रक्खे पाँच पैसे भी,एक दौलत से होते थे। 

बारिश के पानी में बने उन छोटे से गड्ढों को,
तालाब  समझकर,मजे से तैरा करते थे !
हवा में हिलती परछाइयों  को भूत सोचकर,
भागते थे हम,और अँधेरे से कितना डरते थे। 

कभी भाई के डर से,अपने हिस्से की मिठाई ,
कोठरी में छिपाकर रख आते थे,
और कभी दीदी से रोनी सी सूरत बनाकर,
एक टॉफी के लिए दस पैसे मांगते थे। 

कैसे दादी के लिए दवाई लेने,दूसरे गाँव ,
हकीम चाचा के पास,मीलों नँगे पाँव दौड़ जाते थे,
रास्तों में पड़े पत्थरों को कभी ठोकर मारते,
तो कभी भूख लगने पर,दूसरों के पेड़ों से आम चुराते थे। 

अब सोचते हैं उन दिनों को,तो खुद पे हँसी आती है,
कैसे जंगली से हम,धूल-मिट्टी में खेला करते थे ,
अमीर गरीब का फर्क भी न समझते थे उन दिनों ,
और फटीचर लड़कों के साथ,गाँव का मेला देखते थे। 

अब कभी जब गाँव की गलियों में किसी बच्चे को,
बापू का हाथ थामे,बेफिक्र सा जाते देखता हूँ,
तो सोचता हूँ कि इन गलियों मे,आखिर मैं कहाँ रह गया,
खेलता रहता था अक्सर जो,माँ के आँचल तले ,
वो बचपन, वक़्त के दरिया में न जाने कहाँ बह गया !
 

Wednesday, July 18, 2012

लम्हों की बारिशें..



कोशिशें नाकाम होंगी ,छुपाने की ,
झूठी मुस्कुराहटों में  हमें ,
जब भी मिलोगे खुद से ,
हम याद तो बहुत आयेंगे !
देखोगे पलट के कभी,
तो हम लम्हों की बारिशों में ,
कहीं चुपचाप खोये से खड़े,
भीगते नज़र  आयेंगे !

Tuesday, June 19, 2012

An MBA's Frustration...

Accounting  के एक्सपर्ट तो बन गए,
पर अपनी ज़िन्दगी की Balancesheet बिगाड़ बैठे,
ये MBA की लड़ाई लड़ते -लड़ते ,
हम खुद को ही कहीं हार बैठे !
Marketing  के फंडे तो बहुत सीखे हमनें ,
पर बेचे भी तो क्या...अपने वो सपने सभी ,
Investments  में ही समय invest किया सारा,
और अपनों के लिए टाइम न मिल सका कभी !
Operations में 'JUST IN TIME' तो बहुत पढ़ा,
पर Family से मिलने कभी टाइम पर न जा सका,
McDonald की Quality से Impressed था इतना,
की अब माँ के हाथ की रोटियाँ भी न खा सका !
Strategy में ही सारा टाइम निकल गया,
और अपनी Life की Strategy कभी न सीखा,
Companies का profit और loss तो बहुत analyze किया,
पर हमें अपनी ही ज़िन्दगी का loss न दिखा !
Consumer Behaviour की analysis करते-करते,
खुद अपना behaviour न जाने कैसा हो गया,
Target market के potential segments तो खोज लिए,
पर उस 'Matrix ' में खुद न जाने कहाँ खो गया !
Business Etiquettes इतने सीख लिए,
की अब दोस्तों से भी मिलते हैं तो clients की तरह,
Process Optimization techniques के तो गुरु बन गए,
पर अपनी लाइफ का 'Objective Function ' कभी optimize न हुआ !
Communication के courses भी बहुत किये ,
पर अब communication सिर्फ Facebook पर ही होता है ,
Spreadsheet के submission पर जागते हैं सारी रात,
और ये आसमान अँधेरे की चादरों तले सोता  है !
Finance की Debt और Equity के पीछे भागते-भागते,
हमनें अपने रिश्तों का 'leverage' इतना बढ़ा लिया,
की अब पलट के देखते हैं,तो सोचते हैं हम..,
की यार ...MBA करके हमनें ऐसा भी क्या पा लिया !!

Thursday, May 24, 2012

भीड़

भीड़ तो दिखती है यहाँ अब भी बहुत,
फिर भी कुछ सूना सा ये शहर लगता है !
रहेने दो हमें इन्ही अंधेरों के तले ,
अब खुले असमानों से बड़ा डर लगता है !
आसान नहीं है तोडना ये उलझनों की दीवारें ,
बाहर तूफानों से घिरा ये मंजर लगता है !
 यादों की महेफिलों में गुजरता है वक़्त अक्सर ,
अब कुछ वीरानियो  से सजा ये घर लगता है !

Tuesday, May 15, 2012

कहानी..














एक दिए के जैसी जलती कहानी ,
चिंगारियों में अक्सर पिघलती कहानी,
आँखों से बहते ये सपने सुनहेरे,
कभी मौसमों सी बदलती कहानी !
कहेती कभी आसमानों को छू लो ,
ऐसे उड़ो की उड़ानों को छू लो ,
कभी हारकर बैठ जाती कहानी,
कभी खुद को ही गुनगुनाती कहानी !
कभी टिमटिमाती,कभी डूब जाती,
कभी फ़िर जगाकर झूठे सपने दिखाती ,
जिंदगी की किताबों में मिलती है अक्सर,
सतरंगी रंगों सी सजती कहानी !
कभी सीधी-साधी ये चलती सी जाती,
कभी मुस्कुराकर बदलती कहानी,
यादों की बारिशें करती ये अक्सर ,
कभी ठहेरे पानी सी चलती कहानी !!

Sunday, April 29, 2012

मुझे उस पार जाना है















सफ़र मुश्किल बहुत है अब ,मुझे अब लौटना होगा !
कदम फिर लड़खड़ाते हैं ,वो अक्सर याद आते हैं !

कोई पत्थर नहीं हूँ मैं ,बिखरकर टूट सकता हूँ !
मुझे कितना संभालोगे,
वो अक्सर याद आते हैं !
सितारों से मिले अरसा हुआ,
बहुत नाराज़ तो होंगे!
यही साथी थे उम्र भर,
घेर लेते थे महेफिलों में,
तनहा जानकर मुझको ! 
अब  ढूँढू कितना भी,
फिर बीते वो हुए पल,
जो कही खो से जाते हैं,
वो अक्सर याद आते हैं ! 
जब उनका हाथ थामा था,
तो ये समझे नहीं थे हम !
वो एक बहता हुआ दरिया,
साहिलों से कहाँ रिश्ता !
आज हम किनारों पे खड़े ,
उधर वो बहेते जाते हैं ,
वो अक्सर याद आते हैं ! 
वो शायद कभी तनहाइयों मे ,
पलटकर देखते होंगे,
यादों की किताबों में ,
उन सुनहेरे पन्नों को ! 
बस इतना सोचकर हम,
अकेले चलते जाते हैं,
वो अक्सर याद आते हैं !
 कदम उनके भी शायद ,
ठहर जाते तो होंगे अचानक ,
जब उन गलियों में कहीं पर ,
एक आवाज़ गूँजती होगी , 
कहीं कुछ मुझसे मिलती सी..! 
इन्ही उम्मीदों के सहारे ,
अब हम भी मुस्कुराते हैं ,   
वो अक्सर याद आते हैं !
बहुत चाहा चलें अब उस सफ़र पर फिर,
जहाँ अजनबी थे हम-तुम ,
जहाँ अनजान थे रिश्ते !
फिर कुछ सोचकर बढ़ते कदम,
अचानक रुक से जाते हैं..
वो अक्सर याद आते हैं !

Monday, April 23, 2012

Emptiness..














God..! From this world so unknown,
Burning inside from dusk to dawn.
Please take me back to the point,
Where things were new and I stood alone.
To the place,Where all this journey had started,
My eyes are burning now, my soul is exhausted,
A place,without hope,without any brightness,
Please God... take me back to my emptiness...!!

Sunday, April 15, 2012

एक नाव सी चलती ये ज़िन्दगी..














एक नाव सी चलती हुई ये ज़िन्दगी,
 कभी डूबती-उतराती  सी है !
मझधारों मे फँसती है कभी ,
कभी लहेरों के थपेड़े खाती है !
तेज़ हवाओं में  डगमगाती अक्सर,
तो कभी खुद ही संभल जाती है !
तूफानों का सामना करती है कभी ,
तो कभी टूट कर  बिखर जाती भी है !
रूकती है अपने किनारों पर कुछ वक़्त को,
फिर चुपचाप लहेरों के साथ चली जाती है !
एक नाव सी चलती हुई ये ज़िन्दगी.......!



Saturday, April 14, 2012

पलट कर..

पलट कर पुरानी यादों के पन्ने,
सोचा की आज कुछ नया लिखूं !
कहूँ कोई कहानी तेरी रौशनी की आज,
अब अपने अंधेरों की दास्ताँ मैं क्या लिखूं !
बयाँ करूँ तेरी नीली आँखों की झीलों को,
या उन शोख अदाओं का फ़लसफ़ा लिखूं !
कहूँ खुद को तेरी एक झलक का आशिक,
और तुझे मुहब्बत का ख़ुदा लिखूं .... !



Wednesday, April 4, 2012

Life..

















Life...I have seen you,
As an artist,carving characters,
from my morbid soul,
and guiding me on,
to reach my destiny.
Like a friend sometimes,
who is always there,
giving me wings to fly,
as a guard,to protect me,
when blues were soring high.
I have seen you,
As a slayer sometimes,
inescapable and brutal,
breaking me down in bits,
and doing me again,
ever sturdy and strong.
Like a tough competitor,
crushing me every time,
Then,helping me up and fight,
a touch so strong and divine.
Sometimes I wonder...,
This journey,without you,
How I would've completed.
I won't have lived for sure,
I would have just existed...!

Tuesday, April 3, 2012

Mask..














To blend in shades,Like everyone around,
I wear a mask,and gag my sound.
I am a predator,I live in the dark,
I hunt my prey,with edges sharp.
I play wild, I act savage,
A living corpse,I feel no damage.
I rip the hearts and steal the soul,
To rule this wilderness is all my goal.
Controlled by lust and driven by desires,
I move in stealth and play with fires.
'A game of lives' is what I call,
Therefore,I am the most dangerous of all.

Monday, April 2, 2012

Funeral














There is beauty in funeral,
I find music in mourning,
The body,lies on a pyre,
and people around,Crying.
The smell of burning flowers,
And ashening body's fragrance,
This mix unwinds an aroma,
And releases an sensuous essance.
The burning of bones and blood,
and turning into the blue coal,
I watch evaporate it with smoke,
and meet its ultimate goal.
The tar flows smoothly,
When the flames and skin meet,
The flesh melts like an icecube,
and the body wrinkles with heat.
The soul searches for a new mold,
Another shape the divine hands cast.
Ages after ages the same story,
And it all returns to dust at last ..!!

Sunday, March 25, 2012

Paradise..

















Sprinkles of rain drops
The clouds hovering around,
A gush of cold wind,
and birds making sound.
The jungle becomes alive,
And grasses turn green,
Flowers start blooming,
the beauty so unseen .
The smell of wet soil,
And rivers singing music,
The calmness of trees,
The earth acts so mystic,
Sometimes I wonder,
Do Gods really live in skies?
People say its nature,
I call this a Paradise .!!

Tuesday, March 20, 2012

It Matters not..

It matters not to me,
How rough the life has been.
How badly it broke me at times,
and lots of its colours I have seen.
It matters not how many hands left me,
For now,I have lost those counts,
Sometimes it hurts a lot ,
and sometimes funny it sounds.
Now I sit back and wait for my spirits,
knowing that pains are the other half.
And the joy of living through this journey,
makes me smile and laugh !!

Sunday, March 18, 2012

न जाने क्यों ....

कितनी बारिशें आयीं, पर  मिटा न सकी,तेरे पैरों के उन निशानों को,
जो कभी तूने  मेरी छत की गीली रेत  पर ,चल कर  बनाये थे..!
तेरे रुमाल का एक कोना,जो फँस गया था,मेरी कुर्सी के किनारे कभी ,
वो आज भी वही है,और वहीँ रहेना चाहता है ,बरसों तक, न जाने क्यों !
 शाम ढलते ही वो तेरा ,एक चाय का ग्लास ,चुपके से मेरी खिड़की पे रख जाना,
 और अपनी छत पर भागकर,मुझे अखबार पढ़ते ,एकटक देखते जाना ..
अब अपनी चाय अक्सर खुद ही बना लेता हूँ ,अकेले बंद कमरे में  ,
पर अब वो बड़ी फीकी सी लगती है ,न जाने क्यों !
वो खिड़की ,जिससे मुझे तू अक्सर देखा करती थी..
 वो अब बन्द  हो जाया करती है,शाम ढलते ही .. !
गली की उस दूकान पर ,एक दुपट्टा,जो तूने देखा था एक दिन ,
 तेरे लिए वो सँभाल के रक्खा है ,बहुत वक़्त से ..
पर अब उसमें कुछ सलवटें सी पड़ गयी हैं,न जाने क्यों !
 वो पत्थरों का ढेर,अब भी पड़ा है, मेरे कमरे के कोने में ,
जिन्हें तू अक्सर ले आती थी ,नदी के उस पार से ,भगवान् सोचकर,
उन्हें रोज कुछ फूल तो अब भी चढ़ा देता हूँ,जैसा तूने बोला था ..
पर  अब उसमें मुझे भगवान् नहीं दीखता, न जाने क्यों ....!!

Tuesday, March 13, 2012

आखिरी मुलाकात..

सामने होकर भी चुपचाप खोये से क्यों बैठे हैं वो,
ये उनसे आखिरी मुलाकात,इतनी मुश्किल सी क्यों लगती है !
जो अक्सर कहा करते थे मुस्कुराकर,कि भूल जाओ हमें ,
आज उनकी ही आँखें यूँ, आँसुओं से भीगी क्यों दिखतीं हैं.. !!

Thursday, March 8, 2012

होली..

उस बंगले के अन्दर,होली का सा माहौल था ,
और खेल रहे थे कुछ बच्चे,हँसते-खिलखिलाते हुए,
रंगों में लिपटे,खुशियाँ मानते हुए !
और गेट के बाहर,एक छोटी सी लड़की,
उन्हें खेलता देखकर खुश होती जाती थी !
हँसती  थी,जब वो हवा में रंग उड़ाते थे ,
और हर बौछार पर उछलकर तालियाँ बजाती थी !
कुछ देर बाद,अन्दर उस बंगले से ,
बहता हुआ सा कुछ रंग आया !
उस बच्ची ने डरते हुए आस-पास देखा,
और फिर झुककर थोड़ा सा रंग उठाया !
कुछ गीला  किया उन छोटी सी हथेलियों को,
और कुछ अपने गालों पर लगाया !
फिर भागी वो,अपने उस झुण्ड मे,
जहाँ कुछ और भी बच्चे थे उस जैसे ,
फटे कपड़ों में,कुछ बदरंग से !
होली का माहौल तो इधर भी था,
बस,रंग एक ही,कुछ मटमैले पानी सा !
पर आज वो कुछ रंगों में रंगी ,
अपने झुण्ड में अलग सी खड़ी थी !
वो ख़ुशी,जरा सा रंग पाने की ,
उन नन्हीं आँखों में पहले कभी न दिखी थी..!!

Tuesday, March 6, 2012

ख्वाब..

इश्क करना यूँ आसान न था ,कुछ कदम हम चले,और कुछ आप आये !
ये मौसम भी अब कुछ बदले से लगने लगे,आप जब से हमारे साथ आये !
कल आपको पाने की उम्मीद न थी,आज जब आये ये पल,तो बेहिसाब आये !
अब दुआ यही, कि हमारी आँखों के आशियाने में रह जाएँ आप,
फिर हम कभी हकीकत में देखें आपको,और कभी आपका ख्वाब आये !


Sun Shine..


Today shines the sun again,
the darks are about to die.
My body stands tall,
and the spirits are high ,
Life came with all smiles,
No more fears and no more cry !
'How blue it used to be..'
my soul said with a deep sigh .
Now,the fog is long gone,
and clear is my sky !
I am again in my wings,
and again..I am  ready to fly !!

Tuesday, February 14, 2012

Valentine-Day

कभी यूँ भी हुआ करता था वक़्त,बस कुछ अरसा हुआ,
जहाँ दो लब्ज़ बात भी करने के, बहाने तलाशे जाते थे !
आज इतना खो गए हम,खुद की उलझनों में ही ,
कि अब प्यार भी करते हैं, तो तारीखें देखकर ..!!

Monday, February 13, 2012

अहसास..

यूँ चुपचाप सर झुकाए क्यों बैठे हैं ,
ये आपकी खामोशियाँ,मेरी एक सजा हैं !
इतना संभल कर चले भी तो क्या चले,
कभी लड़खड़ाकर भी देखिये सफ़र में,
किसी की बाहों में गिरने में क्या मजा है !
ज़िन्दगी हर दिन लिखती है एक कहानी नयी,
कुछ कहानियाँ कभी भूली नहीं जातीं,
और कुछ अफसाने यूँ ही बेवजह हैं !
अपने हिस्से की जिंदगी तन्हाँ तो बहुत जी लिए अब,
किसी और की ज़िन्दगी बनके तो देखिये,
कि उस अनकहे अहसास में क्या मजा है.....!!
......V-Day Special !! :) 

Wednesday, January 18, 2012

उलझनें..

क्यों खामोश सी चलती हुई जिंदगी अचानक,
एक दिन लाकर खड़ा कर देती है ऐसे मोड़ पर,
जहा से अक्सर लेने पड़ते हैं,राहों के फैसले !
क्यों एक दिन आता है,ऐसा भी जिंदगी में ,
जब छोड़ना पड़ता है,अक्सर उन्हें भी ,
अब तलक जो राह पर,हमसफ़र बनकर चले !
क्यों टूटते हैं एकदिन वो सपने सारे,
किसी कच्चे धागे की कुछ लड़ियों की तरह,
और आँखों से बिखरते हैं आंसुओं के मोती ,
किसी जश्न में जलती फुलझड़ियों की तरह !
अब अपने रास्तों के अँधेरे हम मिटायें भी तो कैसे,
ये जिंदगी आजकल कुछ उदास सी रहेती है ,
किसी मुरझाये फूल की बेरंग पंखुड़ियों की तरह.. !!

Sunday, January 15, 2012

एक बचपन...


आज देखा एक बचपन,
हड्डियों के ढाँचे सा,
एक चाय की दूकान पर,
बर्तन माँजता हुआ !
आँखें कहीं ठहेरी थीं उसकी,
उम्मीदों के कुछ बाकी निशाँ लिए,
हसरतें कुछ और न थीं उसकी,
बस अपनी जिंदगी जीने के अरमाँ लिए !
ख़ुद में कहीं डूबा हुआ,
वो भीड़ में खोया हुआ सा !
मैंने यूँ ही पूछा ,
"माँ बाप कहाँ हैं तेरे ?"
वो बोला "साहब.....,
माँ-बाप होते तो यूँ बचपन नहीं रोता,
सर्दियों की इन रातों में ,
भूखे पेट यूँ सड़कों पे नहीं सोता !"
मैंने पूछा "पढाई नहीं करते क्या ?"
वो बोला "पढना तो है...,
इसलिए ही पैसे जमा कर रहा हूँ ,
पर सुना है कि स्कूल की फीस बहुत होती है,
सोचता हूँ जब कभी पैसे हो जायेंगे,
तो स्कूल में एड्मिसन जरूर लूँगा,
मेरा बचपन तो खो गया कही सड़कों पर,
पर कुछ बच्चों को उनका बचपन जरूर दूँगा !"
मैंने कहा "क्या बनोगे बड़े होकर ?"
वो बोला "बस दफ्तर में बाबू बनना है साहब,
बचपन तो बीत गया,जमीन पर ही बैठे हुए,
पर एक दिन मुझे भी कुर्सी पे बैठना है साहब..... !!"

Friday, January 6, 2012

अक्सर...


हज़ारों की भीड़ में,बस एक तेरा चेहरा तलाश करते हैं,
खामोशियों के साए में,हम खुद से ही बात करते हैं !
राहों पे चलते हुए,तेरे साथ की एक आदत सी हो चली थी,
अब तू नहीं,तो हम तेरी यादों से मुलाकात करते हैं !
हाथों की वो लकीरें,मिट गयी थीं जो कभी,
उनमें हम आज भी, बस तेरी एक लकीर तलाश करते हैं !
भुलाना भी चाहें तो तुझे भूलें कैसे,
वो अफ़साने दिल के दरवाजों पे दस्तक देकर,हमें बेताब करते हैं !
वो सूनी गलियां,जो रोशन थी कभी तेरी मुस्कुराहटों से ,
उन्हें अब  हम तेरी यादों के जुगनुओं से आबाद करते हैं !
बीते हुए वक़्त के बादल,वापस तो अब न आयेंगे,
पर तेरे हाथों के लिखे वो कागज़ के टुकड़े,
अब भी अक्सर तुझे याद करते हैं....!

Hope

Looking out of the window, as things pass by, Wishing we could survive this catastrophe. The one which looked impossible at first, But t...