एक नाव सी चलती हुई ये ज़िन्दगी,
कभी डूबती-उतराती सी है !
मझधारों मे फँसती है कभी ,
कभी लहेरों के थपेड़े खाती है !
तेज़ हवाओं में डगमगाती अक्सर,
तो कभी खुद ही संभल जाती है !
तूफानों का सामना करती है कभी ,
तो कभी टूट कर बिखर जाती भी है !
रूकती है अपने किनारों पर कुछ वक़्त को,
फिर चुपचाप लहेरों के साथ चली जाती है !
एक नाव सी चलती हुई ये ज़िन्दगी.......!

No comments:
Post a Comment