Sunday, April 29, 2012

मुझे उस पार जाना है















सफ़र मुश्किल बहुत है अब ,मुझे अब लौटना होगा !
कदम फिर लड़खड़ाते हैं ,वो अक्सर याद आते हैं !

कोई पत्थर नहीं हूँ मैं ,बिखरकर टूट सकता हूँ !
मुझे कितना संभालोगे,
वो अक्सर याद आते हैं !
सितारों से मिले अरसा हुआ,
बहुत नाराज़ तो होंगे!
यही साथी थे उम्र भर,
घेर लेते थे महेफिलों में,
तनहा जानकर मुझको ! 
अब  ढूँढू कितना भी,
फिर बीते वो हुए पल,
जो कही खो से जाते हैं,
वो अक्सर याद आते हैं ! 
जब उनका हाथ थामा था,
तो ये समझे नहीं थे हम !
वो एक बहता हुआ दरिया,
साहिलों से कहाँ रिश्ता !
आज हम किनारों पे खड़े ,
उधर वो बहेते जाते हैं ,
वो अक्सर याद आते हैं ! 
वो शायद कभी तनहाइयों मे ,
पलटकर देखते होंगे,
यादों की किताबों में ,
उन सुनहेरे पन्नों को ! 
बस इतना सोचकर हम,
अकेले चलते जाते हैं,
वो अक्सर याद आते हैं !
 कदम उनके भी शायद ,
ठहर जाते तो होंगे अचानक ,
जब उन गलियों में कहीं पर ,
एक आवाज़ गूँजती होगी , 
कहीं कुछ मुझसे मिलती सी..! 
इन्ही उम्मीदों के सहारे ,
अब हम भी मुस्कुराते हैं ,   
वो अक्सर याद आते हैं !
बहुत चाहा चलें अब उस सफ़र पर फिर,
जहाँ अजनबी थे हम-तुम ,
जहाँ अनजान थे रिश्ते !
फिर कुछ सोचकर बढ़ते कदम,
अचानक रुक से जाते हैं..
वो अक्सर याद आते हैं !

No comments:

Post a Comment

Hope

Looking out of the window, as things pass by, Wishing we could survive this catastrophe. The one which looked impossible at first, But t...