स्याह पत्थरों पे खड़े शहर,
कुछ दूरियाँ बढ़ाती ये सड़कें,
ये अंजान अकेली सी डगर ,
यहाँ एक गाँव हुआ करता था।
इन ईंटों में दबी वो हँसी झूठी,
और अपनापन दूर तक नहीं,
बढ़ती मंज़िलें इमारतों में,
पर हर ओर छाँव की कमी,
यहाँ एक गाँव हुआ करता था।
मोटरों के शोर से गरजती हवाएँ,
ना जाने किस दौड़ में शामिल,
एक भीड़ किधर भागी सुबह से,
लहरों से खुद अंजान ये साहिल,
यहाँ एक गाँव हुआ करता था।
वो गाँव,कुछ धुंधली सी गलियाँ,
इक छोटा बगीचा,वो झोंपड़ी,
आज इमारतें ऊँची,बँगले यहाँ,
पर ज़िंदगी अब खो गई।
लोगो ने बदली सूरतें,थोड़ी आदतें,
बदला कुछ और तो नहीं,
लग गये दरवाज़ों पे ताले ,
और कुछ घड़ियाँ तेज चलने लगीं।
ना होती दौलतें जो,बँगले भी,
तो शायद ज़िंदगी में वक़्त होता,
सूखती न गाँव की नदी अब तक,
आज भी वहीँ नीम का वो पेड़ होता।