Tuesday, November 19, 2013

शायद...

 ये फासले एक दिन दूरियां बन जाएँ,
तो हम बिखर जायेंगे शायद ,
 ये आदतें कभी मजबूरियाँ बन जायें,तो
हम बिखर जायेंगे शायद !

बड़ी दूर मंजिल थी, जरा सा हम चले हैं अब,
कहीं बीच में तुम ठहेरे,तो
हम बिखर जायेंगे शायद !
इधर तो हम खड़े कब से,उधर उनकी वो तन्हाई ,
कहीं फिर वो अंधेरों में उलझे,तो हम बिखर जायेंगे शायद !
राह लम्बी बहुत है अब,कि जिसपे चल पड़े थे हम ,
वो किसी मोड़ पे मुड़ जाएं,तो हम बिखर जायेंगे शायद !
बड़े  सपने सजाये थे,बड़े ही ख्वाब देखे थे ,
सपनों से उतरके हक़ीक़त में जो आ जाएं,तो हम बिखर जायेंगे शायद !
धुन्धली सी ये तस्वीरें,कहाँ तक आँखों में इन्हें रक्खें ,
कहीं दो बूँद गिर जाएं,तो हम बिखर जायेंगे शायद !
अभी कल ही तो संभले हैं,अभी उड़ना नहीं आता ,
 कहीं फिर से अब फिसले ,तो हम बिखर जायेंगे शायद !

Hope

Looking out of the window, as things pass by, Wishing we could survive this catastrophe. The one which looked impossible at first, But t...