नदी की ओर,दूर क्षितिज़ के पार,
आज फिर उधर एक सूरज सा निकला।
धुंधलाया सा, अलसाया सा था,
निकला बादलों की आड़ से छिपता -छिपाता ।
कुछ पल को तो एकटक सा देखता रहा,
फिर मिलने उसे,बेफिक्र हो ,मैं चल पड़ा ।
पंहुचा उधर तो वो न था,
बस बचा था कुछ रौशनी का कारवाँ ।
हँसा खुद की नादानियों पे मैं बहुत ,
फिर मुस्कुराकर खुद से कहा ।
सूरज है वो, रुकता नहीं ,
कुछ पल को था, फिर उड़ चला ।
दिन अब यूँ ही गुज़रता है अक्सर सोचने में ,
आएगा वो वक़्त मेरा भी कभी ,
रूबरू उससे जब मैं मिलूँगा ।
उम्मीद है उस दिन मेरे इंतज़ार मे ,
वो भी वही ठहेरा सा होगा ..
दूर क्षितिज़ के पार .....।

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