आज देखा एक बचपन,
हड्डियों के ढाँचे सा,
एक चाय की दूकान पर,
बर्तन माँजता हुआ !
आँखें कहीं ठहेरी थीं उसकी,
उम्मीदों के कुछ बाकी निशाँ लिए,
हसरतें कुछ और न थीं उसकी,
बस अपनी जिंदगी जीने के अरमाँ लिए !
ख़ुद में कहीं डूबा हुआ,
वो भीड़ में खोया हुआ सा !
मैंने यूँ ही पूछा ,
"माँ बाप कहाँ हैं तेरे ?"
वो बोला "साहब.....,
माँ-बाप होते तो यूँ बचपन नहीं रोता,
सर्दियों की इन रातों में ,
भूखे पेट यूँ सड़कों पे नहीं सोता !"
मैंने पूछा "पढाई नहीं करते क्या ?"
वो बोला "पढना तो है...,
इसलिए ही पैसे जमा कर रहा हूँ ,
पर सुना है कि स्कूल की फीस बहुत होती है,
सोचता हूँ जब कभी पैसे हो जायेंगे,
तो स्कूल में एड्मिसन जरूर लूँगा,
मेरा बचपन तो खो गया कही सड़कों पर,
पर कुछ बच्चों को उनका बचपन जरूर दूँगा !"
मैंने कहा "क्या बनोगे बड़े होकर ?"
वो बोला "बस दफ्तर में बाबू बनना है साहब,
बचपन तो बीत गया,जमीन पर ही बैठे हुए,
पर एक दिन मुझे भी कुर्सी पे बैठना है साहब..... !!"

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