Sunday, March 18, 2012

न जाने क्यों ....

कितनी बारिशें आयीं, पर  मिटा न सकी,तेरे पैरों के उन निशानों को,
जो कभी तूने  मेरी छत की गीली रेत  पर ,चल कर  बनाये थे..!
तेरे रुमाल का एक कोना,जो फँस गया था,मेरी कुर्सी के किनारे कभी ,
वो आज भी वही है,और वहीँ रहेना चाहता है ,बरसों तक, न जाने क्यों !
 शाम ढलते ही वो तेरा ,एक चाय का ग्लास ,चुपके से मेरी खिड़की पे रख जाना,
 और अपनी छत पर भागकर,मुझे अखबार पढ़ते ,एकटक देखते जाना ..
अब अपनी चाय अक्सर खुद ही बना लेता हूँ ,अकेले बंद कमरे में  ,
पर अब वो बड़ी फीकी सी लगती है ,न जाने क्यों !
वो खिड़की ,जिससे मुझे तू अक्सर देखा करती थी..
 वो अब बन्द  हो जाया करती है,शाम ढलते ही .. !
गली की उस दूकान पर ,एक दुपट्टा,जो तूने देखा था एक दिन ,
 तेरे लिए वो सँभाल के रक्खा है ,बहुत वक़्त से ..
पर अब उसमें कुछ सलवटें सी पड़ गयी हैं,न जाने क्यों !
 वो पत्थरों का ढेर,अब भी पड़ा है, मेरे कमरे के कोने में ,
जिन्हें तू अक्सर ले आती थी ,नदी के उस पार से ,भगवान् सोचकर,
उन्हें रोज कुछ फूल तो अब भी चढ़ा देता हूँ,जैसा तूने बोला था ..
पर  अब उसमें मुझे भगवान् नहीं दीखता, न जाने क्यों ....!!

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