Saturday, October 2, 2010

सपने

सपने लिए आँखों मे, जब चला था राह पर,
मन मे आशायें भरी थी,पर कठिन था वो सफ़र !
मिली एक मंज़िल तो,कदम बढ़ चले यकायक,
दूसरी मंज़िल पाने को,मैं चलता रहा अनवरत!
मंजिले मिलती रही,खुशियाँ देती रही छड़ भर,
पास आज कुछ भी नही,देखता हूँ जब पलटकर!
सब कुछ ओझल हो गया ,छोड़कर स्मरतियाँ अनंत,
याद नही कहाँ से चला था, और कहाँ अंत !
मन मे लिए लालसाएँ अपरिमित,उम्र भर दौड़ता रहा,
ज़िंदगी की इस भाग दौड़ मे ,रिश्ते नाते तोड़ता रहा!
देखता हूँ जब स्वयं को ,पल भर भी आईने मे आज,
नज़र आता हूँ खड़ा,कृत्रिमता की ओढ़े पोशाक !
घृणा क्यों मेरे हृदय मे,आज इतनी भरी हुई,
प्रेम और संवेदना क्यों,दूर इतनी खड़ी हुई!
खड़ा हूँ एकाकी मंज़िल पर ,पास कोई भी नहीं,
ओझल हुए पैरों के निशान,वापस जा सकूँ......संभव नहीं !!!
सोचता हूँ कभी,क्या गर्व करूँ ,उन मिथ्या उपलब्धियों पर,
पाई थी मैने कभी जो, सर्वस्व अपना त्यागकर !
बैठा हूँ मन में अभीतक,संजोए वो मधुर यादें सभी,
सुलगती हुई एक आशा हृदय में, जीवन जो मौका दे कभी!
लौट चॅलू वापस उन गलियों में,लिखने को एक नयी कहानी,
जी लूँ एकबार फिर से मैं, वो अल्हड़ बचपन,वही जवानी... !

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