Friday, November 7, 2014

हिस्से की रौशनी..

आखिरी पन्नो पे आकर रुक गयी कहानी,
अभी लगता है ये किस्सा खत्म हुआ नहीं.
धुंध में तलाशा करते थे हम कुछ अक्सर,
और सूरज की उस धूप को अब तक छुआ नहीं.
फिर समुन्दर में उठेंगी ये सिमटी सी लहरें कभी,
और हम फिर पहले जैसे ही गुनगुनाएंगे.
थक गए से लगते है आज ये कदम हमारे,
पर इक दिन अपने हिस्से की रौशनी पाने,
ये फिर से उन्ही रास्तों पे दौड़ जायेंगे.

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