Wednesday, January 28, 2015

टूटा हुआ तारा














आसमान से टूटा तारा,रग्घू  के घर मुन्नी आयी थी ,
दिया एक जलता था घर में,सन्नाटे की परछाईं थी।
मुन्नी के पैदा होते ही,रग्घू बाहर ये सोच रहा,
सर्दी की ठंडी रातों में,माथे से पसीना पोंछ रहा ।
जब पांच बरस हो जाएगी मुन्नी,तो कहीं काम पर लगवा दूँगा ,
दूर शहर साहब का बँगला,वही मुन्नी को रखवा दूंगा।
मजदूरी तो न होगी उन हाथों,पर झाड़ू -पोंछा तो कर लेगी ,
ज्यादा क्या कमाएगी शायद,पर अपना पेट ही भर लेगी।
माँ की यादों में मुन्नी रोयेगी क्या,लड़की है,खुद संभल जाएगी,
गुड्डे-गुड़िया न होंगे वहाँ, पर नौकरों के बच्चों में पल जाएगी।
भेजेगी कुछ पैसे अक्सर जो,उनसे मुन्ने को पढ़ाऊंगा ,
मुन्ना चार  बरस का हुआ,अब उसे स्कूल भिजवाऊंगा। 
भीतर-बाहर दौड़ेगी मुन्नी,और एक दिन नाक कटायेगी ,
हरिया की नज़रें ठीक नहीं,अपने सिर आफत आएगी। 
कैसे लाऊंगा इतने पैसे,मुन्नी की शादी भी करनी होगी ,
एक और लड़के की इच्छा थी,पर अब ये गलती तो भरनी होगी।
देखा था मुन्ने की माँ ने,काश वो सपना सच्चा होता,
पैदा होते ही मर जाती मुन्नी,तो कितना अच्छा होता।

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