Monday, June 8, 2015

ख़ुदा ने कहीं, मेरे लिए भी..

ख़ुदा ने कहीं, मेरे लिए भी कुछ लिखा होगा ,
यहाँ हैं इम्तेहाँ हरपल,वो हमसे क्यूँ ख़फ़ा होगा।
नज़र अंदाज़ करना पर,उसने सीखा नहीं अब तक,
किसी भी मोड़ पर पलटो ,वहीं पर वो खड़ा होगा।
हम ही एक नासमझ होंगे,अब तक ढूँढा नहीं उस को,
चलो नज़दीक से देखें,इन्ही लकीरों में छुपा होगा।
चलना मेरा फिर भी,और फिर टकराना अंधेरों से,
कहीं उम्मीद तो होगी ,कहीं कुछ तो दिखा होगा।
गुजर जाएगी रात,चलो आज कुछ नज़दीकियां कर लें,
फिर कल के  उजालों में,कश्मकश का सिलसिला होगा।
उम्मीदों के दायरों में उसकी,हमें बंधना नहीं आता ,
शिकायतें कुछ होंगी उसकी भी,जब वो मुझसे मिला होगा।
ये जो चुपचाप से हैं हम,इन्हें खामोशियाँ मत समझो ,
अनकही नाराज़गियां सी होंगी,कहीं शिकवा-गिला होगा।
तलाशो मत, छुपी बातें बहुत हैं,इन वीरान कोनों में,
वहीँ पर हम भी खोए हैं ,शायद उसको पता होगा।
ख़ुदा ने कहीं, मेरे लिए भी कुछ लिखा होगा …

No comments:

Post a Comment

Hope

Looking out of the window, as things pass by, Wishing we could survive this catastrophe. The one which looked impossible at first, But t...