थोड़ा ठहरूं, या चलता रहूं उस पार तक,
खो गईं , क्यूं अब दिखती नहीं वो मंजिलें।
लौट जाऊं,या यूं ही वक़्त गुजारूं शाम तक,
कुछ और ही हैं, मेरी ज़िन्दगी की उलझनें।
थोड़ा डरता था अब तक, पर अब चल पडूंगा,
जहां तुम ना सही, पर आसमां तो होगा सिर छुपाने को,
अलग दिखूंगा भीड़ में , पर शायद अकेला नहीं ,
तुम्हारी कुछ यादें रख ली हैं ,साथ आने को।
खो गईं , क्यूं अब दिखती नहीं वो मंजिलें।
लौट जाऊं,या यूं ही वक़्त गुजारूं शाम तक,
कुछ और ही हैं, मेरी ज़िन्दगी की उलझनें।
थोड़ा डरता था अब तक, पर अब चल पडूंगा,
जहां तुम ना सही, पर आसमां तो होगा सिर छुपाने को,
अलग दिखूंगा भीड़ में , पर शायद अकेला नहीं ,
तुम्हारी कुछ यादें रख ली हैं ,साथ आने को।

No comments:
Post a Comment