Friday, December 16, 2011

तन्हाईयाँ

 शहर की वीरानियों से  दूर,
तेरी यादों की ढलती शाम पे,
आज घिरा जब तनहाइयों में तो फिर लगा,
ज़िन्दगी में शायद कही कुछ खो सा गया  !
ठोकर लगी जब फिर उसी राह पर चलते हुए ,
और कही भी जब सहारा न मिला ,
दिखे जब हर तरफ अन्जान चेहरे ,तो फिर लगा,
ज़िन्दगी में शायद कही कुछ खो सा गया  !
कभी तेरा साया जो हर पल था साथ मेरे,
जिसकी छाँव में दिन निकल जाता था ,कुछ पलों की तरह,
पर आज जब तन्हाईयों में ,खुद से ही मैं लड़ा,तो फिर लगा,
ज़िन्दगी में शायद कही कुछ खो सा गया  !
यही जिंदगी कभी इतनी खूबसूरत  भी थी,
की उम्मीदों के घरौंदे बना बैठे थे हम ,
आज जब बिखरे वो आशियाने रेत के, तो फिर लगा ,
ज़िन्दगी में शायद कही कुछ खो सा गया  !
मुस्कुराते तो हम अब भी हैं तेरी यादों के साथ,
वो मीठे पल तन्हाईयों  में कभी गुदगुदाते भी हैं,
पर आज जब मुस्कुराते हुए एक आंसू गिरा तो फिर लगा,
हाँ...... जिंदगी में कहीं...कहीं  कुछ  खो सा गया  !!

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