Tuesday, October 8, 2019

फासले



आज इजाज़त दो, तो तुमसे ,तुम्हारी शिक़ायत करूं।
कुछ अपनी कहानी सुनाऊं, कुछ तुमसे लड़ूं ।

कहां से शुरू करूं, थोड़ा सा ही वक़्त अभी बाकी है,
अपनी कहानी के पन्नों में,अब मेरी शिकायतें ही मेरी साथी हैं।

कुछ ना सुनना आदत मेरी,ना कह पाना मजबूरी तुम्हारी,
मुस्कुराहटों का चेहरे पे बहुत कम आना, ऐसी ही बातें बहुत सारी।

लड़ते पर अपनी बात कह देते ,क्या मिला यूं खामोशियों से उलझ जाने में,
चंद कदमों की जिंदगी, बीत गई कुछ पास, कुछ दूर जाने में ।

खो जायेंगे हम भी भीड़ में,अब वो मुलाकातें कहां होंगी,
कहेने को होगा बहुत कुछ, पर वो शामें ,वो रातें कहां होंगी ।

ये कहानी यहीं तक थी शायद, कुछ कहेना है तो आज कह देना,
ये वक़्त भी फिसल जाएगा कल, बस जाने की इजाज़त दे देना।

अब दूरियां बढ़ेंगी,कुछ फासले होंगे, फिर मिलना कहां होगा,
बदल चुके हम पता अपना,अब ना वो गली, ना मकां होगा ।

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