आज का दिन भी यूं ही गुजर गया,
कहेने को कुछ खास नहीं,
देखा पलटकर ,कुछ यादों को जाते हुए,
तो मुस्कुरा दिया,अब उदास नहीं ।
फिर मन के किसी कोने से उठकर, ख्याल आया,
और सच कहूं तो मैंने एक कदम भी बढ़ाया,
पर सोचा की अगर बात होगी भी ,तो तुमसे क्या कहूंगा ,
मेरी खामोशी भी सुन लोगी तुम,शायद चुप ही रहूंगा ।
अब पुराने दोस्तों से बातें बढ़ी,
और किताबे फिर से पढ़ने लगा हूं ,
लिखा था जिनपर, हमने साथ मिलके कभी ,
उन पन्नों को फिर से भरने लगा हूं ।
उठ जाओ,आज ऑफिस नहीं जाना?
बस घड़ी का अलार्म ऐसे नहीं जगाता।
कुछ खाया ? आज क्या बनाया ,ये रोज पूछना,
सीखा है थोड़ा,पर बहुत कुछ अब भी नही बना पाता ।
तुमसे बात करते करते सो जाना ,
कभी गुस्सा करना ,झगड़ना ,फिर मुस्कुराना।
मेरी ही गलती हो ,फिर भी तुम मुझे कैसे माना लेती थी ,
खुद ही सॉरी कहेती, फिर कभी हंसा देती थी ।
कोई जिद सुनने वाला हो ,
तो अक्सर हम ज़िद्दी हो जाते हैं ,
लड़ते हैं अब भी तुमसे यादों में,
फिर चुपचाप कहीं खो जाते हैं ।
रोज देखने , बात करने की आदत ऐसी ,
की सोचा नहीं ,की वक़्त गुजर गया ,
एक दिन आंख खुली,तो तुम नहीं थे उस मोड़ पे,
पर मैं वहीं ठहर गया ।
कभी अपने सपनों में ,कभी मेरी यादों में ,
मिलोगे कहीं ,तो कुछ बताऊंगा एक दिन,
चला था अबतक हाथ थामकर तुम्हारा,
गिरा हूं आज,तो संभल भी जाऊंगा एक दिन ।
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