थोड़ा नाराज़ करूं,
थोड़ा हंसा दूं तुम्हें,
इस सपने से जागा के,
कभी रुला दूं तुम्हें ।
पलट के देखो ,
मेरी इन खामोशियों के उस पार,
आंखों से कुछ कह दूं ,
और कहीं छुपा लूं तुम्हें।
क़दमों के बेइंतेहा फासले ,
कोई शिकायत नहीं,
पर ख्वाहिश यही,
की हाथ बढ़ाऊं और पा लूं तुम्हे ।
हाँ, कुछ देर तो हुई, ये माना,
इतनी दूर आते आते,
पर अब साथ हैं,
तो सोचता हूं ,वक़्त से भी चुरा लूं तुम्हे।
रुकेंगी कभी जो सांसें,
तो सोचेंगे उस पार का,
पर जिंदगी कुछ बाकी हैं अभी,
थोड़ा वक़्त से लडूं,और अपना बना लूं तुम्हें ।
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