Tuesday, September 17, 2019

रोशनी

ये फासले कभी दूरियां बनी,तो शायद हम बिखर जाएं,
ये आदतें फिर मजबूरियाँ बनी,तो शायद हम बिखर जाएं ।

बड़ा मुश्किल है ये रास्ता,जरा सा फिर चले हैं अब,
कहीं तुम बीच में ठहेरे,तो शायद हम बिखर जाएं ।

इधर तो हम खड़े कब से,उधर कुछ वक़्त का थमना,
कहीं तुम खोए अंधेरों में,तो शायद हम बिखर जाएं ।

धुन्धली सी तेरी तस्वीर,आंखों में कहां रखें ,
कहीं दो बूँद गिर जाएं,तो शायद हम बिखर जाएं ।

अभी कल ही तो संभले हैं,अभी उड़ना नहीं आता ,
कहीं फिर से जो अब फिसले ,तो शायद हम बिखर जाएं ।

वही एक रोशनी हो तुम,इन अकेले से अंधेरों में,
जरा सा मुस्कुरा दो जो,तो ये लम्हा गुज़र जाए ।

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